छत्तीसगढ़ वीर कुंवर संघ दुर्गा एवं दशहरा उत्सव समिति इस वर्ष अपनी स्थापना के 40 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दुर्गा उत्सव को भव्य और विशेष रूप से मना रही है। बीते चार दशकों से माँ दुर्गा की आराधना और दशहरा उत्सव का आयोजन करती आ रही समिति ने इस वर्ष माँ दुर्गा की प्रतिमा को असम की पारंपरिक लोककला और बाँस की अनूठी शिल्पकारी से सजाया है, जो श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
इस वर्ष स्थापित माँ दुर्गा की प्रतिमा में असमिया संस्कृति, पारंपरिक बाँस की बुनाई और प्राकृतिक शिल्पकला का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। माँ दुर्गा के वस्त्र, मुकुट, आभूषण और प्रतिमा के पीछे की सजावट को विशेष कलात्मक स्वरूप दिया गया है। माँ दुर्गा के साथ विराजमान अन्य देवी-देवताओं की सज्जा में भी असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई दे रही है।
समिति का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन करना ही नहीं, बल्कि भारत की विविध संस्कृतियों, पारंपरिक कलाओं और कलाकारों की रचनात्मक प्रतिभा को सम्मान देना भी है। इसी उद्देश्य से इस वर्ष छत्तीसगढ़ की धरती पर असम की लोककला को माँ दुर्गा की प्रतिमा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
समिति के अध्यक्ष कोमल अग्रवाल ने बताया कि छत्तीसगढ़ वीर कुंवर संघ पिछले 40 वर्षों से लगातार भव्य रूप से माँ दुर्गा की स्थापना करता आ रहा है। हर वर्ष उत्सव को विशेष और आकर्षक बनाने का प्रयास किया जाता है। इस बार असमिया संस्कृति पर आधारित माँ दुर्गा की प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए एक अनूठी कलात्मक प्रस्तुति है।
(चार दिनों तक होंगे विशेष धार्मिक आयोजन)
सीमित के अध्यक्ष कोमल अग्रवाल ने बताया कि 18 अक्टूबर को विधि-विधान से हवन-पूजन किया जाएगा। इसके बाद 19 अक्टूबर को विशाल भंडारे का आयोजन होगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करेंगे। 20 अक्टूबर को दशहरा उत्सव के तहत भव्य रावण दहन का आयोजन किया जाएगा, जबकि 21 अक्टूबर को माँ दुर्गा की प्रतिमा की विधिवत विदाई की जाएगी।
समिति ने सभी श्रद्धालुओं और शहरवासियों से अपील की है कि वे अधिक से अधिक संख्या में पहुँचकर माँ दुर्गा के दर्शन करें, धार्मिक आयोजनों में शामिल हों और असमिया लोककला से सजी इस अनूठी प्रतिमा की भव्यता का आनंद लें।
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