
गरियाबंद : डॉक्टर फोटो पहले या मरीज!!! गरियाबंद जिला अस्पताल में डिलीवरी के बाद वायरल हुई सीएमएचओ की फोटो पर बाल रोग विशेषज्ञ ने उठाए सवाल. डॉक्टर बिनकर बोले– फोटोशूट के चक्कर में नवजात को हाइपोथर्मिया हुआ
गरियाबंद जिला अस्पताल में अब इलाज से ज्यादा जरुरी है कैमरा एंगल.. ऐसा हम नहीं जिला अस्पताल के ही शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर बिनकर बोल रहे हैं. 15 मई की रात डिलीवरी के बाद पैदा हुए बच्चे ने रोना शुरु नहीं किया था. लेकिन सीएमएचओ डॉ. गार्गी यदु पाल ने उसे गोद में उठाकर मुस्कराना ज़रुर शुरु कर दिया और क्लिक! वायरल फोटो के बाद अब अस्पताल के गलियारे ‘फोटोशूट गेट’ में तब्दील हो चुके हैं.
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र बिनकर ने इस ‘फोटोप्रसव’ को स्टंट बताते हुए आरोप लगाया कि सीएमएचओ मैडम न तो हाथ धोई थीं, न गाउन पहना था. बस पुराने पसीने वाले कपड़ों में नवजात को उठाकर स्टेटस अपडेट कर दिया! नतीजा – बच्चा हाइपोथर्मिया का शिकार हो गया. लेकिन मैडम फोटो खिंचवाती रही. डॉ. बिनकर का दावा है कि बच्चा प्रीमेच्योर नहीं था. बल्कि पूरा 2.5 किलो का बालक है. लेकिन सोशल मीडिया पर सहानुभूति बटोरने के लिए उसे कमजोर बताया गया.
सीएमएचओ डॉ. गार्गी यदु पाल ने पलटवार करते हुए कहा कि वे खुद गाइनेकोलॉजिस्ट हैं और निरीक्षण के लिए वहां पहुंची थी. बच्चा रो नहीं रहा था तो उन्होंने उसे गोद में ले लिया. बाकी डॉक्टर साहब दो घंटे बाद आए. अब अपनी देरी छुपाने फोटो को विलेन बना रहे हैं. सुबह भी मैंने उन्हें एक मामले के लिए डांट लगाई थी.
सूत्रों की माने तो अस्पताल में सोनोग्राफी महीने में सिर्फ दो दिन 9 और 24 तारीख को होती है. बाकी दिन सोनोग्राफी मशीन धूल फांकती है और गर्भवती महिलाएं रायपुर के चक्कर काटती हैं. ग्रामीणों का सवाल है कि जब सीएमएचओ मैडम खुद गाइनेकोलॉजिस्ट हैं. तो सोनोग्राफी और डिलीवरी सिस्टम को नियमित क्यों नहीं करवातीं हैं? या फिर कैमरे के सामने ही ऑपरेशन होता है?
फिलहाल गरियाबंद जिला अस्पताल में इलाज हो या न हो. लेकिन सोशल मीडिया पर ‘प्रसव कला में प्रशासनिक चमक’ जरुर दिखाई दे रही है. और बच्चे? उनकी किस्मत में शायद बस वायरल होना ही लिखा है.



